बेहोशी के दिन

तुमने जितने दिये जहर , मैं पीता चला गया।
एक वक्त था कि ,हर बात मानता चला गया ।
तेरे शहर में आशियाना ना रहा कभी ।
फिर भी मैं जानबूझकर कर , वही आता जाता रहा।
मेरे दोस्तों ने लाख मनाही की थी मगर ।
एक मैं था जो डूबता चला गया ।
मेरे रूह तक को मालूम था ,मिलेगा कुछ नही ।
पर फ़ना की हालत ये थी , मैं बेहोशी में ही रहा ।
पैरों से जुबाँ तक जब साथ ना रहा ।
दोस्तों ने बड़े सलीके से सिद्दत से बिठा दिया ।
मीनार पे टगने को क्यों राजी हो मियाँ ।
जिन्दंगी दो चार नही एक ही है मियाँ ।
इश्क की गली से उतर आओ तुम ।
अपनी बदहाली पे शर्म थोड़ी खाओ तुम ।
ये हाल तुमने जो बना रखा है ,सच नही ।
गर तुम्हारी हालत सच है ,तो ये मोहब्बत सच नही ।

Leave a comment

Design a site like this with WordPress.com
Get started